khalaa zindagi ko main khalta raha phir | खला ज़िंदगी को मैं खलता रहा फिर

  - Manmauji

खला ज़िंदगी को मैं खलता रहा फिर
नतीजन परेशाँ भटकता रहा फिर

मैं फ़त्वों से उसके दहलता रहा फिर
लहू ख़्वाहिशों का गटकता रहा फिर

क़ज़ा को मेरी मुख़बिरी लग रही थी
लिहाज़ा मैं चहरे बदलता रहा फिर

लबों की ये लर्ज़िश थी गिरवी किसी को
तो पानी में प्यासा तड़पता रहा फिर

सुना था कि सजदों से मिलती मोहब्बत
फ़िदाई मैं माथा रगड़ता रहा फिर

अना को फ़ना कर,ना खटका किसी को
ख़ुद अपनी नज़र में खटकता रहा फिर

हँसी सूट करती है चहरे पे मौजी
किसी ने कहा था,तो हँसता रहा फिर

  - Manmauji

Zindagi Shayari

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