खला ज़िंदगी को मैं खलता रहा फिर
नतीजन परेशाँ भटकता रहा फिर
मैं फ़त्वों से उसके दहलता रहा फिर
लहू ख़्वाहिशों का गटकता रहा फिर
क़ज़ा को मेरी मुख़बिरी लग रही थी
लिहाज़ा मैं चहरे बदलता रहा फिर
लबों की ये लर्ज़िश थी गिरवी किसी को
तो पानी में प्यासा तड़पता रहा फिर
सुना था कि सजदों से मिलती मोहब्बत
फ़िदाई मैं माथा रगड़ता रहा फिर
अना को फ़ना कर,ना खटका किसी को
ख़ुद अपनी नज़र में खटकता रहा फिर
हँसी सूट करती है चहरे पे मौजी
किसी ने कहा था,तो हँसता रहा फिर
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