दर्द हम सेे कभी बयाँ न हुआ
जल गया दिल मगर धुआँ न हुआ
इक मैं थी पागलों सी दौड़ आई
एक तू था कि बे-कराँ न हुआ
बस जताया नहीं मगर अपमान
मुझ को महसूस कब कहाँ न हुआ
मैं तो ख़ुद इस जहाँ में मेहमाँ हूँ
इस लिए घर का मेज़बाँ न हुआ
चूम बैठे वो ख़्वाब में आरिज़
ये तो अच्छा हुआ निशाँ न हुआ
कर ही देता हूँ तिफ़्ल सी हरकत
'उम्र के साथ दिल जवाँ न हुआ
ख़ुल्द में तुम ख़ुदा तलाशोगे
क्या करोगे वो गर वहाँ न हुआ
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