इश्क़ में दरियादिली मेरी मुसीबत हो गई
आ गया उस मोड़ पर तुझ से ही नफ़रत हो गई
दिल में इक जंगल घना है और मैं हूँ दर-ब-दर
दर-ब-दर फिरना मुझे मेरी हक़ीक़त हो गई
अब मिरा मतलब नहीं है नीली छत वाले से कुछ
मैं अकेला सो गया हूँ और इबादत हो गई
ये मिरे दिल की तमन्ना मैं तिरे दिल में रहूँ
और फिर तेरे ही दिल से मेरी हिजरत हो गई
ज़िंदगानी जीने दे तो जी भी लें हम कुछ घड़ी
ये मगर अब क्या हुआ जो फिर मुहब्बत हो गई
आ गई सब कुछ गँवा कर तुझ को पाने की घड़ी
और फिर सब कुछ गँवाना मेरी फ़ितरत हो गई
— nakul kumar















