इन्ही पिछले दिनों से कुछ मुझे इस बात का ग़म है
अगर मैं रो रहा हूँ तो तिरी क्यूँ आँख पुर-नम है
तिरी तस्वीर है ये रात है बारिश है बादल भी
मगर फिर भी न जाने क्यूँ यहाँ कुछ तो अभी कम है
तिरे जाने से कुछ ऐसा है आलम ज़िन्दगानी में
न तेरे बा'द है दुश्मन न तेरे बा'द हम-दम है
तिरी फ़ुर्क़त में इस सर्दी में सीने में जलन सी है
ये मौसम भी मिरी जानाँ बड़ा बद-ज़ात मौसम है
मैं ज़ेह्नी तौर पर बीमार हूँ पिछले महीने से
न कोई साथ हम-दम है न अरहम है न मरहम है
तुझे गुज़रे हुए तो हो गए दो साल बारह दिन
मिरे दिल के मुहल्ले में ये फिर क्यूँ आज मातम है
— nakul kumar















