मैं माटी का माटी मेरी माटी का घर बार
माटी में मिल जाना इक दिन सारा ये संसार
माटी ही तो माँ है मेरी माटी मेरी नार
मैं माटी के बिना अधूरा माटी मेरा प्यार
इस माटी ने किए हैं अब तक मुझ पे सब उपकार
फूल समेटे इस माटी से फिर पहना है हार
मुझे पता है इस माटी से उगना है हर बार
इसीलिए तो हो जाता हूँ माटी का हर बार
माटी से जुड़ पाओगे तो हो जाओगे पार
लाखों बारी सोचो लोगों इतना ही है सार
— nakul kumar















