कभी जो टूटता तारा दिखा है
ख़ुदा से माँगा तेरा राब्ता है
महीना फाग का जबसे चढ़ा है
फ़िज़ा में इश्क़ जैसे घुल गया है
किया है रू-ब-रू इकरार-ए-उल्फ़त
बढ़ाया फाग मेरा हौसला है
करूँ मैं शुक्रिया हर दफ़्'अ तेरा
लकीरों में मुहब्बत लिख दिया है
ये उल्फ़त है या तेरा जादू कोई
उतरता क्यूँ नहीं तेरा नशा है
नज़र से तुम नहीं मुझ को गिराना
मेरे ख़ातिर सनम ये इक सज़ा है
बटे हैं इंसाँ रंगों में यहाँ पर
इन्हें बदरंग किस ने कर दिया है
— NEERAJ SAINI















