हुक़्म है दिल का तो चल देखेंगे
वरना क्यूँ ख़्वाब-महल देखेंगे
ज़िन्दगी ब्याही गई है ग़म से
आगे की फ़िल्म को कल देखेंगे
आप तो हुस्न के क़ाइल हैं बस
आप क्या मेरी ग़ज़ल देखेंगे
पहली ख़्वाहिश थी कभी हम दोनों
साथ में ताजमहल देखेंगे
अपने अंदर से निकल आए हैं
तुझ से बाहर भी निकल देखेंगे
ख़ाली करना ही पड़ेगा घर अब
माँ को बच्चों से बदल देखेंगे
— Neeraj Neer















