किया फिर उन सेे मैं इज़हार नित
मगर इस बार भी इनकार नित
नज़र ने माँग ली थी चाँदनी
मिला लेकिन वहीं हर बार नित
लिखे ख़त कितने ही जज़्बात में
रहे लफ़्ज़ों में फिर भी भार नित
गुज़रती शाम आई पास जब
बढ़ा दिल में तबस्सुम यार नित
— Nit
मगर इस बार भी इनकार नित
नज़र ने माँग ली थी चाँदनी
मिला लेकिन वहीं हर बार नित
लिखे ख़त कितने ही जज़्बात में
रहे लफ़्ज़ों में फिर भी भार नित
गुज़रती शाम आई पास जब
बढ़ा दिल में तबस्सुम यार नित
Other ghazal from the same pen
Voices in the same orbit
Poetry by feeling