ज्यूँ पकने के कगार पे आने लगी है फ़स्ल
बाज़ार सूचकांक गिराने लगी है फ़स्ल
हैरत में है किसान पसीने को बेच कर
ख़ाली है जेब और ठिकाने लगी है फ़स्ल
खेतों में लहलहा के जो कहती थी कान में
वा'दा वो बिन निभाए ही जाने लगी है फ़स्ल
गुड़िया वो कल तलक़ थी नई फ़्रॉक माँगती
बिक़ते ही लाड़ली को चिढ़ाने लगी है फ़स्ल
आँखों ने माँ की बच्चों को घुड़का तो यूँ लगा
मजबूरियों में उस को दबाने लगी है फ़स्ल
सरकार से अनेकों बनीं योजनाऍं पर
लो काग़ज़ों में बिक के दिखाने लगी है फ़स्ल
हिस्से सभी के तय हैं मुहर्रिर हों या कि बॉस
बँट-बँट के सबकी जेबों में जाने लगी है फ़स्ल
हैरान हूँ मैं क़र्ज़ों में डूबा हुआ किसान
इसबार तो नथुने भी डुबाने लगी है फ़स्ल
सूखा मैं इस के साथ दुपहरी में जेठ की
इस से मुझे भी अश्कों भिगाने लगी है फ़स्ल















