सुनो क़िस्सा हमारी ज़िन्दगी का
अगर खुलकर कहें तो आशिक़ी का
हुआ जब इश्क़ तो हमने ये जाना
नहीं रहता है बस में दिल किसी का
उसे भर टोकरी चिट्ठी लिखी थी
बताओ क्या करें उस टोकरी का
मैं मुस्काता हूँ तो सब पूछते हैं
हुनर सीखा कहाँ से शा'इरी का
नहीं आएँगे अब कलयुग में मोहन
भले रोता रहे मन द्रौपदी का
Read Full