मिलेगी न अब तो मुहब्बत कभी भी
पड़ेगी न इसकी ज़रूरत कभी भी
ख़ुशी पर हमारा भी हक़ था मगर यूँँ
ग़मों ने नहीं दी इजाज़त कभी भी
मदीने की गलियों का चक्कर लगा लूँ
मिले आप की गर शफ़ाअत कभी भी
ओ ज़ालिम ज़रा कुछ तो ख़ौफ़-ए-ख़ुदा कर
कि आ सकती है अब क़यामत कभी भी
तकब्बुर तू दौलत पे इतना भी मत कर
चिपक सकती है तुझ से ग़ुर्बत कभी भी
बदल वो गुनाहों का पाएगा अपने
जो करता नहीं है नदामत कभी भी
ग़मों से रिहा होंगे परवेज़ साहब
अगर मिल गई कुछ मसर्रत कभी भी
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