इश्क़ का ज़र्फ़ आज़मा तो सही

तू नज़र से नज़र मिला तो सही

मिल ही जाएगा ज़िन्दगी का सुराग़
दोस्तों के फ़रेब खा तो सही

दिल को तस्कीं न हो तो मैं ज़ामिन
तू कभी मय-कदे में आ तो सही

ज़ीस्त अश्क़ों में ढल न जाए कहीं
दोस्त इक बार मुस्कुरा तो सही

ज़िन्दगी को सँभालने वाले
तू कभी पी के लड़खड़ा तो सही

हम ही समझे न मुद्द'आ 'रिफ़अत'
उन की नज़रों ने कुछ कहा तो सही

— Rifat Sultan

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