साथ दिक़्क़त में रहा करते हैं हम
जान महफिल की हुआ करते हैं हम
वो हवा छूती है जैसे शाख़ को
उस सलीक़े से छुआ करते हैं हम
क्या हुआ वो गर जुदा है, ख़ुश रहे
बस यही हरदम दुआ करते हैं हम
ये भी आख़िर उस ने हक़ खो ही दिया
अब नहीं ग़ुस्सा हुआ करते हैं हम
सामने आए नहीं वो शख़्स अब
इक ज़रा सी बद-दुआ करते हैं हम
— Rudransh Trigunayat















