साथ दिक़्क़त में रहा करते हैं हम
जान महफिल की हुआ करते हैं हम
वो हवा छूती है जैसे शाख़ को
उस सलीके़ से छुआ करते हैं हम
क्या हुआ वो गर जुदा है, ख़ुश रहे
बस यही हरदम दुआ करते हैं हम
ये भी आख़िर उसने हक़ खो ही दिया
अब नहीं ग़ुस्सा हुआ करते हैं हम
सामने आए नहीं वो शख़्स अब
इक ज़रा सी बद्दुआ करते हैं हम
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