वो उस्ताद है या फ़ाज़िल लगता हैवो ही शख़्स मुझ को क़ाबिल लगता हैहिम्मत बाँध कर आया हूँ मैं वरनापहले-पहल मिलना मुश्किल लगता है— Rudransh Trigunayat