गिले शिकवे भुलाकर क्यूँँ नहीं चलते
दिलों से दिल मिलाकर क्यूँ नहीं चलते
सियासत के बिछाए जाल हैं ये सब
ये मन में तुम बिठाकर क्यूँ नहीं चलते
पड़ा है जो तुम्हारी आँख पर यकसर
वही पर्दा हटाकर क्यूँ नहीं चलते
हुआ क्या है फ़क़त कुछ ख़्वाब टूटे हैं
नए सपने सजाकर क्यूँ नहीं चलते
अँधेरे में रखोगे ख़ुद को यूँ कब तक
कि लौ ख़ुद ही जलाकर क्यूँ नहीं चलते
— Rupesh Rahi















