कम-समझ हूँ अभी पर निखर जाऊँगा
एक दिन सबके दिल में उतर जाऊँगा
जिस्म हूँ मैं फ़क़त रूह हो तुम मेरी
तुम से बिछड़ा जो मैं तो किधर जाऊँगा
मारना मन को हरगिज़ गवारा नहीं
शौक़ से मुफ़लिसी में मैं मर जाऊँगा
मान पर बात जो आ पड़ेगी कभी
हो कठिन रास्ता मैं गुज़र जाऊँगा
वक़्त बदला अगर साथ होंगे खड़े
सोचते हैं जो ये मैं बिखर जाऊँगा
नौकरी मिल गई है तो लगता है ये
शहर में कुछ नहीं है मैं घर जाऊँगा
— Rupesh Rahi















