तन्हा न अपने आप को अब पाइए जनाब
मेरी ग़ज़ल को साथ लिए जाइए जनाब
नग़्मों की बारिशों में कहीं भीगने चले
मौसम की आरज़ू को न ठुकराइए जनाब
रिश्तों को भूल जाना तो आसान है मगर
पहले ख़ुद अपने आप को समझाइए जनाब
ऐसा न हो थमें हुए आँसू छलक पड़े
रुख़सत के वक़्त मुझ को न समझाइए जनाब
मैं 'साज़' हूँ ये याद रहे इस लिए कभी
मेरे ही शे'र मुझ को सुना जाइए जनाब
— Saaz Jabalpuri















