पहले ये सोचता था अँधेरा नहीं हुआ
जाने के बा'द उस के सवेरा नहीं हुआ
ले कर चला गया उसे कौड़ी के दाम में
मैं दे रहा था प्यार सो मेरा नहीं हुआ
फिरते रहे भटकते रहे शहर शहर हम
अपना किसी जगह पे भी डेरा नहीं हुआ
उस नाज़नीं को क़ैद रखे कोई आज तक
दुनिया में ऐसा कोई सपेरा नहीं हुआ
तब तक खड़ा रहा वहाँ उम्मीद ले के मैं
जब तक कि उस का आख़िरी फेरा नहीं हुआ
— Sagar Sahab Badayuni















