सारी दुनिया से नहीं तुझ से शिकायत थी मुझे
क्या ही समझेगा तिरी कितनी ज़रूरत थी मुझे
तेरी चाहत से मुहब्बत थी मुझे जैसी भी हो
मुझ से चाहत हो तुझे इतनी सी हसरत थी मुझे
मैं बड़ा ख़ुश था मिरी दुनिया में बरसों बा'द फिर
आ गई मुझ को नज़र वो जिस से नफ़रत थी मुझे
फिर नहीं निकले मिरी आँखों से आँसू ये कभी
उस को रोया था बहुत जिस से मुहब्बत थी मुझे
अब कहीं आया मुझे ख़ामोश रहने का हुनर
बोलते रहने की बचपन से ही आदत थी मुझे
— Sagar Sahab Badayuni















