सितारे यूँँ शाम-ओ-सहर देखते हैं
नज़ारे ज्यूँ अहल-ए-नज़र देखते हैं
रहा कब नशेमन ये यादों से ख़ाली
तुम्हें देखते हैं जिधर देखते हैं
सबा जब कभी चलती है तुझ को छू कर
गुलिस्ताँ में तेरा असर देखते हैं
सुकूनत थी जिन की ये आँखें हमारी
न जाने वो किस की नज़र देखते हैं
न आने को वापस तो तू जा चुका है
मगर राह ये बाम-ओ-दर देखते हैं
— shahnawaaz khan















