फ़क़त इक आँख ही रोने से मुश्किल में नहीं आती बदन भी चीख़ता चिल्लाता है दिल की नमी से ख़ूबमिरे कमरे में फैला ख़ून है चारों तरफ़ किस काहुई है जंग किस की रात भर यूँ ख़ुद-कुशी से ख़ूब— Sayeed Khan