" नींद "
ये नींद भी एक आफ़त है
कभी आते-आते रह जाती है,
तो कभी सारी रात जगाती है
इस की भी क्या शराफ़त है
कभी ग़मों की सैर कराती है,
तो कभी दर्द चुपके सह जाती है
कमाल की इस की शरारत है
कभी दिन में आ कर सुलाती है,
तो कभी रात में बड़ा रुलाती है
बहुत ख़ूब इस की नज़ाकत है
कभी मन को ख़ूब लुभाती है,
कभी ख़्वाब-ए-महबूब दिखाती है
बड़ी प्यारी इस की हिमाक़त है
कभी तो बातें-वातें कर जाती है,
कभी कुछ भी नहीं बतलाती है
शायद इसे मुझ से मोहब्बत है
कभी तन्हाइयों में आ जाती है,
कभी अंगड़ाइयों में सताती है
— Sahil Verma















