मुश्किलों में क़रार की सूरत

कोई निकले बहार की सूरत

तू जो रूठा है तो चमन में अब
गुल भी निकले हैं ख़ार की सूरत

रुख़ से पर्दा हटा सबा उस के
मुझ को दिखला दे यार की सूरत

मुस्कुरा कर किया सितम मुझ पर
उस ने बदली न वार की सूरत

जब दवा कोई भी असर न करे
काम करती है यार की सूरत

बाज़ी-ए-इश्क़ जीत कर ज़ाहिद
मैं ने देखी है हार की सूरत

सूरत-ए-हाल हैं मेरे जैसे
है वही ग़मगुसार की सूरत

गुल से हटती नहीं नज़र शादान
कौन देखे है ख़ार की सूरत

— Shadan Ahsan Marehrvi

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