यूँँ तुझे सामने अपने मैं बिठाया करता

तू मुझे देखती मैं तुझ को निहारा करता

देख कर मुझ को निगाहें तू चुराया करती
अपनी आँखों से तुझे मैं भी इशारा करता

तू मिरे शानों पे सर रख के यूँ सोया करती
मैं तिरे ख़ुशबू को साँसों में समाया करता

देर तक हम भी जो इक दूजे से करते बातें
मैं तुझे अपनी ग़ज़ल पहले सुनाया करता

— Shahanwaz Ansari

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