चमकेगा कब मेरा भी नसीबा आक़ामैं पहुँचूँ दर पर कहता आक़ा आक़ाकुछ भी तो मेरे पास नहीं बख़्शिश कोहाँ इतना ज़रूर कि हूँ मैं तुम्हारा आक़ा— Shahanwaz Ansari