सामने आ के कभी वार नहीं कर सकता
एक बुज़दिल कभी यलग़ार नहीं कर सकता
प्रेम में ख़ुद को जो मिस्मार नहीं कर सकता
प्रेम उस शख़्स का उद्धार नहीं कर सकता
इश्क़ इलहाम है होता है जो दीवानों को
इश्क़ तुम जैसा समझदार नहीं कर सकता
बैठ कर फिर वो किनारे पे तमाशा देखे
अपनी बाहों को जो पतवार नहीं कर सकता
कुछ शिकायत है तो घर आओ कभी फ़ुरसत में
मैं तमाशा सर-ए-बाज़ार नहीं कर सकता
बेड़ियाँ खोल दो तलवार थमाओ इस को
एक लाचार पे मैं वार नहीं कर सकता
मेरी मर्ज़ी मैं किसी दाम पे बेचूॅं ख़ुद को
फ़ैसला इस का ख़रीदार नहीं कर सकता
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