ज़िंदा रखती है जिस की परछाई
एक ऐसा दरख़्त है माई
कैसे उस घर में ख़ुश रहे माई
भाई से लड़ रहा जहाँ भाई
बाद मुद्दत के भर रहे हैं ज़ख़्म
'उम्र गुज़री तो छट रही काई
रहनुमा हो गए कहाँ ओझल
मेरी राहों में खोद कर खाई
तू नहीं है ये अब हुआ एहसास
मैं अचानक से इस तरफ़ आई
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