koi kuchh bhi kahtaa rahe sab khaamoshi se sun leta haius ne bhi ab gahri gahri saansen lena seekh liya hai | कोई कुछ भी कहता रहे सब ख़ामोशी से सुन लेता है

  - Shariq Kaifi

कोई कुछ भी कहता रहे सब ख़ामोशी से सुन लेता है
उस ने भी अब गहरी गहरी साँसें लेना सीख लिया है

पीछे हटना तो चाहा था पर ऐसे भी नहीं चाहा था
अपनी तरफ़ बढ़ने के लिए भी उस की तरफ़ चलना पड़ता है

जब तक हो और जैसे भी हो दूर रहो उस की नज़रों से
इतना पुराना है कि ये रिश्ता फिर से नया भी हो सकता है

जैसे सब तूफ़ान मिरी साँसों से बंधे हों मुझ में छुपे हों
दिल में किसी डर के आते ही ज़ोर हवा का बढ़ जाता है

मैं तो फ़सुर्दा हूँ ही लेकिन अश्क रक़ीब की आँख में भी हैं
एक महाज़ पे हारे हैं हम ये रिश्ता क्या कम रिश्ता है

रंग में हैं सारे घर वाले खनक रहे हैं चाय के प्याले
दुनिया जाग चुकी है लेकिन अपना सवेरा नहीं हुआ है

  - Shariq Kaifi

Rang Shayari

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