और भी लोग उसपे मरते हैं
फूल के पास चंद भवरे हैं
तुझको ही 'इश्क़ की नहीं है ख़बर
वरना तो शहर भर में चर्चे हैं
रूठ जाओ के रूठने वाले
रूठने से भी मान जाते हैं
ज़हन-ओ-दिल में ख्याल हैं तेरे
जैसे ज़िंदान में परिंदे हैं
तू किसी और को मय्यसर है
हम तेरी आरज़ू से लिपटे हैं
फिर न जाने मिलोगे कब हम सेे
आओ तस्वीर खींच लेते हैं
एक दर्पन है दायरा इनका
अक्स तेरे यहीं भटकते हैं
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