और भी लोग उस पे मरते हैं
फूल के पास चंद भवरे हैं
तुझ को ही इश्क़ की नहीं है ख़बर
वरना तो शहर भर में चर्चे हैं
रूठ जाओ के रूठने वाले
रूठने से भी मान जाते हैं
ज़हन-ओ-दिल में ख़याल हैं तेरे
जैसे ज़िंदान में परिंदे हैं
तू किसी और को मय्यसर है
हम तेरी आरज़ू से लिपटे हैं
फिर न जाने मिलोगे कब हम से
आओ तस्वीर खींच लेते हैं
एक दर्पन है दायरा इनका
अक्स तेरे यहीं भटकते हैं
— shashwat singh darpan















