मेरे क़रीब बैठ के रोता है एक शख़्स

मुझ तिश्ना-लब के वास्ते दरिया है एक शख़्स

इस तरह इंतिज़ार में बैठी हैं वहशतें
जैसे किसी की आस में बैठा है एक शख़्स

दोनों में राब्ता है और ऐसा है राब्ता
दरिया है एक शख़्स किनारा है एक शख़्स

ऐ राहगीर-ए-राह-ए-अदम देख तो ज़रा
तेरे लिए चराग़ जलाता है एक शख़्स

ऐ मेरी मौत माँगने वालों सुनो अभी
मुझ लाइलाज को भी मसीहा है एक शख़्स

— Shayan Ahmad

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