है मज़ा कुछ नहीं ख़ुशियों का किसी ग़म के बग़ैर
कौन करता है दुआ दीदा-ए-पुरनम के बग़ैर
उस ने बाबा को निकाला था कभी जन्नत से
वो न वापस कभी लेगा शहे आलम के बग़ैर
वुस'अत-ए-सहरा में गुलशन को बसाने वाले
ये करामत कभी मुमकिन न थी ज़म-ज़म के बग़ैर
— Shayan Ahmad















