जिस तरह हम हैं ज़िंदगी के बग़ैर
कोई रहता नहीं किसी के बगैर
हाल अब पूछ ले मिरा तू भी
रो रहा हूँ मैं ख़ामुशी के बग़ैर
अब कभी लौट कर नहीं आना
जीना आता है अब सभी के बग़ैर
छोड़ जाना है तो चले जाएँ
कोई मरता नहीं किसी के बग़ैर
रात ये ज़िंदगी की कब रुकेगी
कब से रहते हैं रौशनी के बग़ैर
एक दिन लोग पूछ ही लेंगे
कैसे रहते हो शा'इरी के बग़ैर
आप बस दफ़्न कर दें मुझ को दोस्त
मर गया हूँ मैं ख़ुद-कुशी के बग़ैर
— Shivam Raahi Badayuni















