यहाँ लोग बैठे हैं नुक़सान कर के
कहाँ आ गए बस्ती वीरान कर के
सभी को ये मैं बात जा कर बताता
यही इश्क़ धोका है ऐलान कर के
उदासी हमारे बदन के है अंदर
कहाँ अब गई रूह बे-ध्यान कर के
मिरा कौन था इक तुम्हारे सिवा जो
मुझे तुम गए ऐसे अंजान कर के
भली कट रही थी उदासी में अपनी
गए ज़िंदगी क्यूँ ये आसान कर के
मिरे ज़ख़्म देखा तो बोला है अब वो
मुझे मौत लगती है पहचान कर के
मोहब्बत नहीं थी उन्हें तुम से 'राही'
गए हैं जो बस मुझ को बे-जान कर के
— Shivam Raahi Badayuni















