उम्र भर का पीछा परछाई नहीं छोड़ेगी क्या
छोड़ भी दे मुझ को तन्हाई नहीं छोड़ेगी क्या
बे-सबब उम्मीद ले कर ज़िंदगी आई यहाँ
देखना है कोई अच्छाई नहीं छोड़ेगी क्या
ख़त्म कर तो दी है उस की याद पर डर है मुझे
अब मिरा पीछा ये शहनाई नहीं छोड़ेगी क्या
ज़िंदगी करने लगी है मुझ को रुसवा और अब
उम्र भर मुझ को ये रुसवाई नहीं छोड़ेगी क्या
कब तलक अब राह देखेंगे तुम्हारी टूट कर
देखना ये आँख बीनाई नहीं छोड़ेगी क्या
है शिकस्त-ए-दिल हमारा जिस तरह बिखरा हुआ
ज़ख़्म क्या कोई भी पुरवाई नहीं छोड़ेगी क्या
— Shivam Raahi Badayuni















