हिज्र में जब से दिल ये जला है

तब समझ आया ये ज़ख़्म क्या है

हाल अब किस तरह हम बताते
हादसा तुम समझ लो टला है

छोड़ कर अच्छा ही कर रहे हो
ज़ख़्म ही तो तुम्हें बस दिया है

है नहीं कोई अपना किसी का
दौर ये किस तरह का चला है

कोई मरहम लगा पूछता ये
ज़ख़्म कितना हरा है बचा है

रात आँसू रहा पास मेरे
रात भर दिल मिरा बस जला है

ज़िंदगी अब वही जीतेगा दोस्त
ज़िंदगी जिस को लगती कला है

— Shivam Raahi Badayuni

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