उसके हाथों पे चढ़ी मेहँदी ख़ूब-सूरत है
लग रही गहने सजाई सी ख़ूब-सूरत है
दूर बीनाई से उस की कहाँ चला जाऊँ
रौशनी साँझ की आँखों की ख़ूब-सूरत है
सज रही आज वो दुल्हन बनी मुहब्बत में
चाँद का बात पे रोना भी ख़ूब-सूरत है
यार पहलू में नसीम-ए-बहार जो भी थी
याद में उनके सुख़न-गोई ख़ूब-सूरत है
अब चलो राह कहीं और खोजे जाएँगे
घर नहीं अब कहीं वीरानी ख़ूब-सूरत है
Read Full