बराबर रौशनी होती है देखो
तुम्हारी बस कमी होती है देखो
ज़मीं का चाँद है चेहरा तेरा ये
फ़लक में चाँदनी होती है देखो
हमें बुझते दियों का ग़म नहीं है
नज़र में रौशनी होती है देखो
ग़रीबी है जहाँ लोगों में अक्सर
वहीं पे सादगी होती है देखो
जवानी चाहता है बचपने में
वही ज़िद आख़िरी होती है देखो
मुसलसल एक चेहरा देखता हूँ
उसी से शा'इरी होती है देखो
— Shubhangi Bharti















