अब कोई नासेह ही करे मसअला हल मेरे लिए

एक लड़की के गालों पे पड़ते हैं सल मेरे लिए

शोहरा होगा शाइस्तगी-ओ-शराफ़त का तेरा पर
ख़्वाब में आने को ज़रा शोख़ी में ढल मेरे लिए

देखता हूँ दहरी के उस पार पसरा सन्नाटा जब
है दरीचे से झाँकता माँ का आँचल मेरे लिए

अजनबी शहरों में कोई अपना खोजा फिरता रहा
बोझ बनती जाती थी तन्हाई हर पल मेरे लिए

ओढ़ के बैठी है सहर कितनी ही रातों का तिमिर
उठ क्षितिज से सूरज के फिर रातों में जल मेरे लिए

— Shubh Mathur

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