अपने तक रहना नहीं ख़ुद से निकलना भी हैफिर मुझे आइने की शक्ल में ढलना भी हैकितनी बातें जो सहज ही उसे कह देनी हैंइक मगर वो जिसे कहने को मचलना भी है— Shubh Mathur