ज़िंदगी भी बची कुछ नहींऔर हुआ भी अभी कुछ नहींसोचूँ तो उम्र भी कम है अबदेखूँ तो शा'इरी कुछ नहींप्यास इक घूँट की मार हैपी लूँ तो बाल्टी कुछ नहींहाल पे मेरे यूँ हँसती हैजैसे वो जानती कुछ नहींरोज़ इक हुस्न पर मरना हैऔर तो आशिक़ी कुछ नहींचीखने को मैं भी चीख लूँऐसे तो गायकी कुछ नहीं— Simar Gozra