ख़ाक समझेगा कोई पल भर में
आग किस सम्त से लगी घर में
लोग तो इस तरह से देखे हैं
जैसे आसेब हों मेरे घर में
जिस ने मेरी हँसी ख़ुशी छीनी
अब तलक जीता है उसी डर में
एक कश्ती थी जान की दुश्मन
छोड़ कर आ गया समंदर में
और कितना तुझे मैं महकाऊँ
और ख़ुशबू नहीं गुल-ए-तर में
एक हद तक ही यार को पूजा
कौन पड़ता वफ़ा के चक्कर में
अपनी क़िस्मत बदलता रहता है
इक नुजूमी है हर सुख़न-वर में
ख़ुद पे सारे 'अज़ाब ले लूँगा
याद करना कभी तू महशर में
किस के हिस्से की बच गई सोहिल
आज थोड़ी शराब साग़र में
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