khaak samjhega koi pal bhar men | ख़ाक समझेगा कोई पल भर में

  - Sohil Barelvi

ख़ाक समझेगा कोई पल भर में
आग किस सम्त से लगी घर में

लोग तो इस तरह से देखे हैं
जैसे आसेब हों मेरे घर में

जिस ने मेरी हँसी ख़ुशी छीनी
अब तलक जीता है उसी डर में

एक कश्ती थी जान की दुश्मन
छोड़ कर आ गया समंदर में

और कितना तुझे मैं महकाऊँ
और ख़ुशबू नहीं गुल-ए-तर में

एक हद तक ही यार को पूजा
कौन पड़ता वफ़ा के चक्कर में

अपनी क़िस्मत बदलता रहता है
इक नुजूमी है हर सुख़न-वर में

ख़ुद पे सारे 'अज़ाब ले लूँगा
याद करना कभी तू महशर में

किस के हिस्से की बच गई सोहिल
आज थोड़ी शराब साग़र में

  - Sohil Barelvi

Gulshan Shayari

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