मैं कहूँगी सभी से कि फ़ुरसत नहीं
दरमियाँ तुम नहीं कोई उल्फ़त नहीं
चूमना माथ पे और लगना गले
ख़्वाब है ये मगर मेरी क़िस्मत नहीं
ग़ौर से देख लो पुर कशिश ये जहाँ
आज की रात है फिर तो क़ुर्बत नहीं
हादसों से कहो ये बताएँ वजह
जो कुचल कर गया है वो मूरत नहीं
— Sristi Singh















