'हादिसा-ए-इश्क़'

उस से मिल लूँ तो उस से क्या होगा ?
फिर जुदा मुझ से वो इक मर्तबा होगा

मेरे रोने पे वो रोने वाला,
किस ने सोचा था कि बे-वफ़ा होगा

किस ने चाही है मौत मगर मेरे,
पास न कोई और रास्ता होगा

लग रहा था दिल जिस रफ़्तार से मेरा,
लग रहा था कि कोई हादिसा होगा

— Shashank Shekhar Pathak

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