ग़ज़ल तुझ पर मैं कहना चाहता हूँ
तू क्या है मैं बताना चाहता हूँ
तू समझे दिल-लगी को खेल कोई
मैं फिर भी दिल लगाना चाहता हूँ
मैं हूँ मयख़ाने में तो क्या है हैरत
मैं ख़ुद भी ग़म भुलाना चाहता हूँ
मुझे उस की नज़र से जो बचा ले
कोई ऐसा बहाना चाहता हूँ
मुसलसल बहती हैं आँखें मिरी अब
मैं भी सागर बनाना चाहता हूँ
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