kitnii raatein kaat chuka hooñ par vo vasl ka din | कितनी रातें काट चुका हूँ पर वो वस्ल का दिन

  - Tehzeeb Hafi

कितनी रातें काट चुका हूँ पर वो वस्ल का दिन
इस दरिया से पहले कितने जंगल आते हैं

हमें तो नींद भी आती है तो आधी आती है
वो कैसे हैं जिनको ख़्वाब मुकम्मल आते हैं

इस रस्ते पर पेड़ भी आते हैं उसने पूछा
जल कर ख़ुशबू देने वाले संदल आते हैं

कौन है जो इस दिल में ख़ामोशी से उतरेगा
देखो इस आवाज़ पे कितने पागल आते हैं

इक से भड़ कर एक सवारी अस्प-औ-फील भी है
जाने क्यूँ हम तेरी ज़ानिब पैदल आते हैं

  - Tehzeeb Hafi

Nadii Shayari

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