हाँ ये सच है कि मोहब्बत नहीं की
दोस्त बस मेरी तबीयत नहीं की
इस लिए गांव मैं सैलाब आया
हम ने दरियाओ की इज़्ज़त नहीं की
जिस्म तक उस ने मुझे सौंप दिया
दिल ने इस पर भी कनायत नहीं की
मेरे ए'जाज़ में रखी गई थी
मैं ने जिस बज़्म में शिरकत नहीं की
याद भी याद से रखा उस को
भूल जाने में भी गफलत नहीं की
उस को देखा था अजब हालत में
फिर कभी उस की हिफाज़त नहीं की
हम अगर फतह हुए है तो क्या
इश्क़ ने किस पे हकूमत नहीं की
— Tehzeeb Hafi















