मेरे चेहरे से मैं ख़ुश दिख रहा हूँ
मगर अंदर से मैं भी मर चुका हूँ
तेरी तस्वीर बटुए में रखी है
उसी से मैं गुज़ारा कर रहा हूँ
मुझे वो ख़्वाब में इक दिन मिला था
हक़ीक़त में जिसे मैं ढूँढता हूँ
मेरी तो कोई माशूक़ा नहीं है
भला मैं रात भर क्यूँ जागता हूँ
ज़रा अब आज़मा लूँ दोस्तों को
मोहब्बत में तो धोखे खा चुका हूँ
अकेला छोड़ देते हैं मुझे सब
यक़ीं कर दोस्त मैं इतना बुरा हूँ
मेरी ये शायरी कहती है मुझ सेे
मैं ही मरहम मैं ही तेरी दवा हूँ
किसी से 'इश्क़ कर बैठा था मैं सो
उसी के 'इश्क़ में पागल हुआ हूँ
तुम्हें कुछ भी नहीं मालूम अभिषेक
मैं कितनी बार और कितना लुटा हूँ
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