कहा जो मैं ने ग़लत कर रही हो चुन के मुझे

अचानक उस ने कहा चुप ये बात सुन के मुझे

कोई जुनून हवा में उड़ा दे मेरा वजूद
कोई असा हो जो रूई की तरह धुनके मुझे

किसी ने कह के जब इक हाँ बसाया दिल का जहाँ
क़सम ख़ुदा की समझ आए मआ'नी कुन के मुझे

उधेड़ दे गर इरादा नहीं पहनने का
ये क्या कि एक तरफ़ रख दिया है बुन के मुझे

शजर से काट लिया है तो अपनी मेज़ बना
अगर नहीं तो फिर आने दे काम घुन के मुझे

कल एक रेल की छिक छिक से रुक्न याद आए
मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन के मुझे

तुम्हारे लौटने तक कुछ बुरा न हो गया हो
न साथ छोड़ना मुझ जैसे बद-शगुन के मुझे

फ़क़ीर लोग समझ आएँ या न आएँ 'उमैर'
कोई समझता नहीं है सिवाए उन के मुझे

— Umair Najmi

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