हम इस घर को कब से सँभाले हुए हैं
इसी घर से तो हम निकाले हुए हैं
करी जब हिफ़ाज़त तो हम ने ये देखा
हमारे भी हाथों पे छाले हुए हैं
दुआ उस से जब भी मिली है मुझे तब
मिरी ज़िंदगी में उजाले हुए हैं
नहीं कोई शिकवा रहा उलझनों से
हम अब उलझनों के हवाले हुए हैं
ये जो डस रहे हैं मुझे आजकल यूँ
सभी साँप ये मेरे पाले हुए हैं
— Usman Saifi















